तुम्हारा हाल कैसा है?

बहुत सादे से लहज़े में, उसने मुझसे ये पूछा था,
"बताओ चल रहा है क्या और हालात कैसे हैं?
तुम्हारा काम कैसा है और दिन रात कैसे हैं?"
बहुत दिल पर ज़बर करके, बज़ाहिर मुस्कुरा करके,
मैंने उससे छुपाया था कि यहाँ काँटों की नोकों से,
नरम नाज़ुक गुलाबों को, उठाने की क़वायद को,
ज़माने का चलन कहके, सब पर थोपा जाता है।
यहाँ जज़्बातों को तरक़्क़ी के मसाइल रौंद देते हैं।
ज़िन्दगी का ये पैमाना, यहाँ रहना यहाँ हंसना,
तसद्दुद की हदों से मरके वापस आने जैसा है।
मैं उससे कहना चाहता था, यहाँ मुझको नहीं रहना,
मुझे कहीं और जाना है, यहाँ से दूर जाना है।
मगर हालात ऐसे थे, कुछ उससे कह नहीं पाया।
ख्वाब भीतर हीं मार करके, मैंने उसको बताया था,
"यहाँ सब कुछ अच्छा है, तुम्हारा हाल कैसा है?"

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