है मेरी अपनी मधुशाला

अब क्यूँ भटकेहै नैन हमारे,
जो तू सुमना है सुरबाला
कोई चमन से फूल चुने क्यूँ,
तू खुद है पुष्पों की माला

सुषमा सा सौन्दर्य है तेरा,
नाज़ुक लता सी तू बाला
गंध तेरा चन्दन सा है
और बदन जैसे बहती हाला

क्यूँ तडपे अब कोई गगन को,
जब तू बन बैठी है शाला
क्यूँ पूजे कोई पत्थर को,
जब रब से मिलाती है प्याला

कौन निहारे साकी को अब
क्यूँ पिए कोई प्याला
तेरे आने से जीवन ही मेरी,

बन गयी इक मधुशाला !!!

No comments:

Post a Comment