चोट लगते
रहें, जख्म मिलता
रहे,
दर्द कितना
भी हो, मुस्कुराते
रहो ...
तुम्हे देख कर
लोग ज़िंदा रहें,
लबों पे
हंसी ऐसी लाते
रहो ...
खुद ही
रौशन रहो, जुगनुओं
की तरह,
धुंध कितना
भी हो, जगमगाते
रहो ...
गर ज़मीं
पर रहो चीड़-चन्दन रहो,
खुशबुओं से गगन
गमगमाते रहो
...
नफरतों के अगन
से हो जलता
जहां,
हर किसी
से मोहब्बत जताते
रहो ...
उजड़ते हों घर या
बसा आशियाँ,
नया इक
गुलिस्तान बनाते रहो ...
प्रलय भी वोही
है, सृजन भी
उसी का,
नाम
लेते रहो,
गुनगुनाते रहो
...
दर्द कितना
भी हो, मुस्कुराते
रहो ...
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